आज का राहुकाल/ 10 दिसंबर-16 दिसंबर (दिल्ली)

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राम नाम रटते रहो, जब तक घट में प्राण...
अनुवाद उपलब्ध नहीं है |

 राम नाम रटते रहो, जब तक घट में प्राण। कभी तो दीन दयाल के, भनक पड़ेगी कान।।


जब-जब पृथ्वी पर बुराई अपने पांव पसारती है, तब-तब भगवान मानव अवतार में जन्म लेकर पृथ्वी पर आते हैं और बुराई का अंत करते हैं । शास्त्रों में वर्णन है कि विष्णु जी के अवतार श्री राम का जन्म भी बुराई का अंत करने के लिये और धर्म की पुनः स्थापना करने के लिये अयोध्या नरेश दशरथ के महल में हुआ था, हालांकि राजा दशरथ को राम को पाने के लिये बहुत यत्न करने पड़े थे । काफी वर्षों बाद भी दशरथ का वंश संभालने वाला कोई नहीं था । राजा दशरथ की तीन रानियां सबसे बड़ी कौशल्या, दूसरी सुमित्रा और तीसरी कैकेयी थी परंतु तीनों रानियां निःसंतान थी । एक बार राजा दशरथ ने अपनी सारी व्यथा अपने राजगुरु वसिष्ठ को बतायी । तब राजगुरु वसिष्ठ ने उनसे कहा- ‘हे राजन ! तुम श्रृंगी ऋषि को बुलाकर ”पुत्र कामेष्टि यज्ञ“ कराओ । इस यज्ञ से तुम्हें अवश्य ही संतान की प्राप्ति होगी । राजगुरु की बात सुनकर राजा दशरथ स्वंय श्रृंगी ऋषि के आश्रम में गए और अपनी सारी बात बताकर उनसे ”पुत्र कामेष्टि यज्ञ“ कराने की प्रार्थना की । श्रृंगी ऋषि ने प्रार्थना स्वीकार करके अयोध्या के महल में ”पुत्र कामेष्टि यज्ञ“ कराया । यज्ञ के समाप्त होने पर श्रृंगी ऋषि ने दशरथ को नैवेद्य के रूप में खीर का एक पात्र दिया और अपनी रानियों को खिलाने को कहा- दशरथ ने उस खीर के पात्र से आधी खीर अपनी बड़ी रानी कौशल्या को दी और आधी खीर सुमित्रा तथा कैकेयी को । उस आधी खीर में से दो भाग सुमित्रा ने और एक भाग कैकेयी ने ग्रहण किया । खीर खाने के कुछ समय बाद ही तीनों रानियां गर्भवती हो गई। इस तरह कौशल्या ने वंश के कुल और अखिल ब्रह्माण्ड नायक श्री राम को सुमित्रा ने शत्रुघ्न व लक्ष्मण की और कैकेयी ने भरत को जन्म दिया था ।

राम जन्म कुंडली- अगस्त्यसंहिता और महर्षि वाल्मीकि जी द्वारा रचित रामायण के अनुसार भगवान श्री राम का जन्म चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के दिन हुआ था । श्री राम के जन्म के वक्त कर्कलग्न में पुनर्वसु नक्षत्र तथा सूर्य अन्य पांच ग्रहों सूर्य, मंगल शनि, बृहस्पति तथा शुक्र के साथ अपनी शुभ दृष्टि बनाए हुए अपने-अपने उच्च स्थान में विराजमान थे। कर्क लग्न में जन्म होने के कारण श्री राम मधुरभाषी, भावुक और मधु मुस्कान वाले थे । कुंडली के दशम भाव में उच्च का सूर्य होने के कारण वे महा प्रतापी राजा बने, लेकिन चैथे घर में उच्च का शनि तथा सप्तम भाव में उच्च का मंगल होने के कारण भगवान श्री राम मांगलिक थे । जिसके कारण ही उनका वैवाहिक जीवन कष्टों से भरा रहा । आश्चर्य की बात तो यह है कि जैसी कुंडली भगवान श्री राम की थी ठीक वैसी ही कुंडली रावण की भी थी, जिसका अंत करने के लिये ही श्री राम अवतार का जन्म हुआ था ।

श्री राम और उनका राज्य-

राम राज बैठे त्रैलोका। हरषित भए गए सब सोका।।

बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप विषमता खोई।।

दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।।

अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा।।

नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।।

सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी।।

रामचरित मानस में तुलसीराम जी ने श्री राम और उनके रामराज्य का सुंदर चित्रण किया है । उन्होंने बताया है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के सिंहासन पर आसीन होते ही सर्वत्र हर्ष-उल्लास व्याप्त हो गया, सारे भय-शोक दूर हो गए एवं सबको दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से मुक्ति मिल गई । कोई भी अल्पमृत्यु, रोग-पीड़ा से ग्रस्त नहीं था, सभी स्वस्थ, बुद्धिमान, साक्षर, गुणी, ज्ञानी तथा कृतज्ञ थे । ऐसा था राम राज्य जो सुख-शांति व समृद्धि की अवधि का पर्याय बन गया था । जहां सबको समान अवसर प्राप्त थे । भारत देश में जब-जब सुराज की बात होती है, रामराज और रामराज्य का उदाहरण दिया जाता है ।

पितृ वचन सर आंखों पर- जब राजा दशरथ ने कैकयी को दिए अपने वचनों को पूरा करने के लिये अपने पुत्र राम से इसके बारे में कहा तो मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने अपने पिता की आज्ञा का पालन किया और माता कैकयी के द्वारा मांगे गए दो वचन, जिसमें से एक श्री राम के वनवास जाने और दूसरा भरत को सिंहासन पर बैठाने का, दोनों को सिर झुकाकर मान लिया और श्री राम खुशी-खुशी 14 वर्ष के लिये वनवास चले गए । साथ ही भ्राता लक्ष्मण और माता सीता भी वनवास को गए और चैदह सालों तक जंगलों में भिन्न-भिन्न जगहों पर विचरण करते रहे।

श्री राम के गुरू- श्री राम के साथ-साथ उनके तीनों भाई भरत, लक्ष्मन और शत्रुघ्न ने बाल्यकाल में ही गुरुकुल में ऋषि गुरु वशिष्ठ से शिक्षा पाई थी । गुरुकुल में रहने के दौरान चारों भाईयों में मानवीय और सामाजिक गुणों का भली-भांति संचार हुआ और बहुत जल्द ही वे वेदों-उपनिषदों के अच्छे ज्ञाता भी हो गये । गुरु वशिष्ठ ने उन्हें शास्त्रों के ज्ञान के साथ ही अस्त्र-शस्त्र विद्या में भी निपुण बनाया । बाद में विश्वामित्र ने श्रीराम को अनेक दिव्यास्त्र प्रदान किए । एक बार अपने यज्ञ को पूर्ण करने के लिए ऋषि विश्वामित्र श्रीराम व लक्ष्मण को अपने साथ वन में ले गए जहां श्री राम ने ताड़का का वध किया और अहिल्या का उद्धार किया । श्री राम को सीता स्वयंवर में ले जाने वाले भी विश्वामित्र ही थे । राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता के विवाह के लिए स्वयंवर का आयोजन किया था जिसका न्योता उन्हें भी आया था और इसीलिए वे राम को लेकर मिथिला गए । वहां श्री राम ने गुरु की आज्ञा पाकर सीता स्वयंवर में न केवल भाग लिया अपितु सीता के साथ स्वयंवर की परीक्षा में पास भी हो गए ।

रामनवमी का पर्व- हिंदू सभ्यता में चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी को दिन रामनवमी का त्यौहार बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखता है । रामनवमी के साथ-साथ मां दुर्गा के नवरात्रों का समापन भी इसी दिन होता है । कहते हैं इस दिन स्वयं भगवान श्री राम ने भी धर्म युद्ध में विजय के लिये दुर्गा मां की पूजा-अर्चना की थी । पुराणों में इसी दिन गोस्वामी तुलसीदास द्वारा ‘रामचरितमानस’ की रचना का श्रीगणेश करने का प्रमाण भी मिलता है । रामनवमी का दिन भगवान राम के जन्मोत्सव के रूप में बड़े ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है । इस दिन राम मंदिरों में शोभा देखते ही बनती है । लोग दशरथ लल्ला ‘राम’ को पालने में झूलाने के लिये बड़ी संख्या में मंदिरों में पहुंचते हैं । इस दिन मंदिर अथवा घर की छत पर ध्वजा लगाने की परंपरा है । कई जगहों पर इस दिन रथ यात्रा निकाली जाती है । साथ ही जगह-जगह पर मेले, भंडारे और अखंड रामायण आदि के पाठ का आयोजन भी किया जाता है । साथ ही इस दिन व्रत रखने की भी परंपरा है । रामनवमी के दिन व्रत करने से पापों का क्षय होता है और शुभ फल की प्राप्ति होती है । इस व्रत से ज्ञान में वृ्द्धि, धैर्य शक्ति का विस्तार, विचारों में शुद्धता, भाव-भक्ति और पवित्रता में भी वृ्द्धि होती है । भगवान राम का जन्म दिन के 12 बजे हुआ था इसीलिए मान्यता के अनुसार राम जन्म के समय के बाद ही इस दिन व्रत तोड़ा जाता है । इस दिन प्रातःकाल स्नान आदि से निवृत होकर व्रत का संकल्प लिया जाता है । तत्पश्चात भगवान राम की पूजा अर्चना की जाती है । इस दिन घरों में खीर, पूड़ी तथा हलवे का भोग बनाया जाता है और उसी को प्रसाद के रूप में ग्रहण करके व्रत तोड़ा जाता है ।

अयोध्या की राम नवमी- पूरे देश में रामनवमी की चाहे जितनी धूम हो, लेकिन अयोध्या की रामवनमी की बात ही अलग है । धार्मिक के साथ-साथ पुरातात्विक दृष्टि से भी इस जगह का काफी महत्व है। अयोध्या नगरी में इस दिन बड़े स्तर पर मेले का आयोजन किया जाता है । रामनवमी के दिन सरयू नदी के तट पर प्रातःकाल में स्नान करने के लिये देश विदेश से लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं । घाट पर भजन, कीर्तन, पूजा-पाठ आदि अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है।

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