आज का राहुकाल/ 10 दिसंबर-16 दिसंबर (दिल्ली)

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अज्ञान है समस्त दुःखों का भंडार
अनुवाद उपलब्ध नहीं है |

अज्ञान है समस्त दुःखों का भंडार

सुख और दुःख जीवन के दो प्रारुप हैं । जिस प्रकार पूरे संसार में समय-चक्र का फेरबदल चलता रहता है । दिन के बाद रात और रात के बाद दिन आना स्वाभाविक है, उसी प्रकार जीवन के चक्र में भी सुख और दुःख का आना-जाना नितांत लगा रहता है । सुख के बाद दुःख और दुःख के बाद सुख...


जब लोगों के जीवन में सुख की एंट्री होती है तो सब बहुत खुश होते हैं, लेकिन जब दुःख आता है तो वही लोग परेशान हो जाते हैं । जब हम किसी चीज की कल्पना करते हैं तो हमें लगता है कि ये जरुर पूरी हो जायेगी, लेकिन जब हमारी वह इच्छा पूरी नहीं होती तो हम अपने आपको और दूसरों को कोसने लगते हैं । यहां तक कि भगवान को भी नहीं छोड़ते । जिसकी वजह से हम दुःखी हो जाते हैं । लेकिन इस कुछ पल के दुःख में हमारे पास बाकी जो भी सुख-सुविधाएं हैं, उन्हें भी हम दरकिनार कर देते हैं और जो चीज हमारी अभी हुई ही नहीं उसके लिए विलाप शुरु कर देते हैं। ये विलाप, ये दुःख आखिर क्यों? आखिर इन दुखों के पीछे का असली कारण क्या है ? इन दुःखों के पीछे का कारण कुछ और नहीं बल्कि एकमात्र अज्ञान है । अज्ञान, यानि ज्ञान का अभाव। जहां ज्ञान नहीं है वहां अज्ञान स्वतः ही आ जाता है । अगर हम दुःखों का विभाजन करें तो यहां दो प्रकार के दुःख सामने आते हैं । पहला शारीरिक और दूसरा मानसिक दुःख और दोनों ही तरह के दुःखों का कारण अज्ञान है । शारीरिक दुःखों को व्याधि और मानसिक दुःखों को आधि कहा जाता है और इन दुःखों को केवल ज्ञान के प्रकाश से ही कम किया जा सकता है । सुख और दुःख अपने समय के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में आते-जाते रहते हैं । लेकिन अहम बात यह है कि कौन इन दोनों परिस्थितियों में अपने आप को संभाल पाता है । ज्ञान की प्राप्ति होने से सुख-शांति, आनंद और समृद्धि की प्राप्ति होती है, वहीं ज्ञान के अभाव में अज्ञान यानि दुःख, चिंता, अशांति, शोक-विलाप जैसे बुरे कारक हमारे जीवन के बीच में आकर खड़े हो जाते हैं । इसलिए अज्ञान के बादलों का जीवन से छटना बहुत ही जरुरी है । अज्ञान के कारण हम किस तरह से अपने सामने रखी हुई अमूल्य या कहें कीमती चीजों को भी गंवा बैठते हैं, इस बात को संत श्री रामकृष्ण परमहंस द्वारा दिए एक उपदेश के माध्यम से आसानी से समझा जा सकता है । एक बार परमहंस जी अपने शिष्यों को उपदेश दे रहे थे । उन्होंने नरेंद्र, यानि स्वामी विवेकानंद जी से कहा- ”कल्पना कर कि तू एक मक्खी है और तेरे सामने एक कटोरे में अमृत भरा हुआ रखा है तो तू क्या करेगा ? तू उसे सिर्फ किनारे बैठकर स्पर्श करेगा या फिर उसमें कूद पड़ेगा ।“ तब विवेकानंद ने कहा- ”मैं किनारे बैठकर उसे स्पर्श करने का प्रयास करुंगा । क्योंकि, अगर मैं बीच में कूदा तो मेरे जीवन के लिए खतरा हो सकता है ।“ इस पर रामकृष्ण जी बोले- ”मूर्ख, जिसके स्पर्श से तू अमरता की कल्पना करता है, उसके बीच में कूदकर भी मृत्यु से भयभीत है । जब तक किसी भी काम में आत्मशक्ति का पूर्ण समर्पण नहीं होता, तब तक सफलता नहीं मिलती ।“ उस दिन शिष्यों को अज्ञान के कारण अवसरों को ना पहचान कर, उसे गंवाने का मतलब समझ में आया । तो इसी तरह आप भी अपने अज्ञान को पहचान कर अपने दुःखों से छुटकारा पाएं और ज्ञान से सुख के आनंद की अनुभूति करें । श्री रामकृष्ण परमहंस जी के अलावा और भी कई महापुरुषों व लेखकों ने अज्ञान को परिभाषित किया है । आदि शंकराचार्य जी- ‘आत्मा अज्ञान के कारण ही सीमित प्रतीत होती है, परंतु जब अज्ञान मिट जाता है, तब आत्मा के वास्तविक स्वरुप का ज्ञान हो जाता है, जैसे बादलों के छट जाने पर सूर्य दिखाई देता है ।

शेक्सपीयर- ‘अज्ञान ही अंधकार है।

चाणक्य- ‘अज्ञान के समान मनुष्य का और कोई दूसरा शत्रु नहीं है।

दार्शनिक प्लेटो- ‘अज्ञानी रहने से जन्म न लेना ही अच्छा है, क्योंकि अज्ञान ही समस्त विपत्तियों का मूल है । अगर आपको लगता है कि आप बहुत ज्ञानी हैं और आप दूसरों से अधिक सामर्थ्यवान हैं, फिर भी आप दुःखी रहते हैं । इस दुनिया में ऐसा कोई भी नहीं है, जिसे सारी चीजों का ज्ञान हो या जिसे दूसरों से कुछ सीखने की आवश्यकता ही नहीं है । हर कोई हर विषय में माहिर नहीं होता । कभी न कभी दूसरों की मदद की आवश्यकता पड़ती ही है । इसलिए अपने इस अज्ञान को मिटाकर अपने ज्ञान में बढ़ोतरी करें और अपने दुःखों से मुक्ति पाएं।

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