Rahukaal Today/ 15 June 2017 (Delhi)-21 June 2017

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जब पुष्पवाटिका में मिले श्री राम-सीता
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जब पुष्पवाटिका में मिले श्री राम-सीता

 

तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में वर्णन किया है कि  स्वयंवर से पहले भगवान राम और सीता मैया जनकपुर (वर्तमान में नेपाल में स्थित है) की पुष्पवाटिका में मिले थे । दरअसल भगवान श्री राम को गुरू वशिष्ठ ने फूल लाने के लिये वाटिका में भेजा था और सीता मैया भी वहां पूजा के लिये अपनी सखी के साथ फूल लाने गई थी । पुष्पवाटिका में दोनों की यह पहली और अचानक हुई मुलाकात थी। पुष्पवाटिका में जब श्री राम और सीता मैया फूल तोड़ रहे थे तभी अचानक दोनों की दृष्टि एक-दूसरे पर पड़ती है । पहली ही बार में दोनों एक दूसरे के प्रति मोहित हो जाते हैं और सीता मैया तो उन्हें देखती ही रह जाती है । राम की मनमोहक छवि को सीता अपने मन के अंदर ऐसे बसा लेती हैं कि फिर कभी वह बाहर न निकल पाये और मन ही मन श्री राम को अपने पति के रूप में भी स्वीकार कर लेती हैं । इस प्रथम दर्शन का वर्णन करते हुए तुलसीदास जी ने लिखा है- लोचन मम रामहि उर आनी दीने पलक कपाट सयानी ।। अर्थात् सीता जी ने आंखों के रास्ते राम को अपने हृदय में उतार लिया है और यह छवि कहीं बाहर न निकल जायें इसलिए चतुर सुजान जानकी ने अपनी आंखों की पलक को कस कर बंद कर लिया, लेकिन जब राम जी वाटिका से चले जाते हैं तो सीता बड़ी व्याकुल हो उठती हैं । उन्हें इस बात की चिंता सताने लगती है कि अब श्री राम से उनकी मुलाकात फिर कभी नहीं होगी, वे उन्हें दोबारा कभी नहीं देख पायेंगी और खासकर कि तब जब उनके पिता राजा जनक ने अपनी पुत्री की खातिर सुयोग्य वर ढूंढने के लिये स्वयंवर का आयोजन किया है । सीता को अब और ज्यादा चिंता सताने लगी थी कि कहीं उनके पिता की शर्त के अनुसार अगर किसी और ने स्वयंवर में शिव धनुष को तोड़ दिया तो क्या होगा । उन्हें किसी और को अपने पति के रूप में स्वीकार करना पड़ेगा । इसी चिंता में सीता मैया मां गौरी की आराधना करती हैं । सीता की आराधना से प्रसन्न होकर मां गौरी, यानि पार्वती माता उन्हें दर्शन देती हैं और चिंता का कारण पूछती हैं तब सीता सारी व्यथा माता को बताती हैं । सीता को माता पार्वती समझाती हैं कि राम साक्षात परमेश्वर हैं । वह सब की मनोदशा को समझते हैं इसलिए तुम्हारी भी मनोकामना पूरी होगी । इस पर तुलसीराम जी लिखते हैं- सुनु सिय सत्य असीस हमारी, पूरहि मन कामना तुम्हारी ।। तुलसीराम जी बताते हैं ”सो बरु मिलहिं जाहिं मन राचा“ अर्थात् पार्वती जी दोबारा कहती हैं कि सीता तुमने मन में जिसे बिठाकर पूजा की है वही सहज, सुन्दर, सांवरा वर तुम्हें अवश्य प्राप्त होगा । राम ही तुम्हें पति के रूप में प्राप्त होंगे । पार्वती ने सीता से कहा श्रीराम करूणानिधान, शीलवान और सर्वज्ञ हैं। वह सब जानते हैं । करूणानिधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो - माता पार्वती की इन्हीं बातों को सुनकर सीता जी ने उसी समय तय कर लिया था कि अब से वे श्री राम को ‘करूणानिधान’ कहकर पुकारेंगी । इसीलिए बाद में विवाह के बाद सीता मैया श्री राम को ‘करूणानिधान’ के नाम से ही पुकारती थी ।

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