Rahukaal Today/ 24 JULY 2017 (Delhi)-30 JULY 2017

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Mata Annpurna ki Vrat Katha
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Mata Annpurna ki Vrat Katha 

 

 

 

माता अन्नपूर्णा की व्रत कथा

माता अन्नपूर्णा की व्रत पूजा

ये व्रत अगहन मॉस के शुक्ल पक्ष के पहले दिन से शुरू करते हैं और २१ दिन तक माता अन्नपूर्णा की पूजा की जाती है | जिससे जीवन में अन्न, धन और सभी सुख समृद्धि प्राप्त होतें हैं इस बार ६ दिसंबर से यह व्रत प्रारंभ हो रहा है | सुबह नहा धोकर माता अन्नपूर्णा के सामने घी का दिया जलाएं और माता अन्नपूर्णा की कथा किसी को सुनानी होती है | अगर कोई न हो तो एलोवेरा (ग्वारपाठा ) का पौधा सामने रखकर कथा कहिये और माता को भोग लगाइए | दो दीपक सुबह और शाम दोनों वक्त जलाइये | व्रत अगर सम्भव हो तो २१ दिन रखिये इदी नहीं सम्भव है तो पहले और आखिरी दिन व्रत करें | और आरती सुबह - शाम दोनों वक्त करें | माता अन्नपूर्णा की कृपा पूर्ण रूप से प्राप्त होगी | और दीपक जलाते समय निम्न कथा कहें और हांथों में पुष्प लेकर माता के चरणों में चढ़ा दें |

कथा :- धनन्जय की पत्नी का नाम सुलक्षणा था | दोनों को सभी सुख प्राप्त थे केवल निर्धनता ही उनके दुःख का कारण था | एक दिन सुलक्षणा ने अपने पति से कहा की स्वामी इस तरह कब तक चलेगा कुछ उद्दयम करो | पत्नी की बात सुनकर धनन्जय घर से निकल कर भगवान् के मंदिर में जाकर बैठ गया | दो दिन व्यतीत होने के बाद उसके कान में अन्नपूर्णा - अन्नपूर्णा इस प्रकार का शब्द सुनाई दिया | धनन्जय ने आँखें खोली और पुजारी से अन्नपूर्णा की बात कही सभी ने कहा तुमने दो दिन से कुछ खाया नहीं इसलिए अन्न की ही बात सूजती है | इसलिए घर जाकर अन्न ग्रहण करो | धनन्जय घर गया और अपनी पत्नी से सारी बात कही | सुलक्षणा ने कहा की जिन्होंने हमें यह ज्ञान दिया है वो हमें इसका मार्ग भी अवश्य बताएँगे | तुम फिर जाकर प्रभू की आराधना करो | अपनी पत्नी की इस बात को सुनकर धनन्जय फिर जंगल की ओर  निकल पड़ा और रास्ते में फल खाता और झरनों का पानी पीता इसी तरह कई दिन बीत गयें | एक दिन कुछ स्त्रियों को अन्नपूर्णा - अन्नपूर्णा कहते हुए धनन्जय  ने सुना | जिस शब्द की खोज में वह निकला था उसे सुनकर उत्सुकतावश धनन्जय उन स्त्रियों के पास पहुंचा और बोला हे देवियों अप यह क्या इस शब्द का उच्चारण करती हुयी क्या कर रही हो उन्होंने कहा की हम माता अन्नपूर्णा जी का व्रत कर रहे हैं | धनन्जय ने कहा की आप लोग हमें भी इस व्रत का विधान बताने की कृपा करें | वो सभी बोली अवश्य |

अगहन मॉस के शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन से २१ दिन तक माता अन्नपूर्णा के इस व्रत का पालन करने से माता प्रसन्न होती है | पहले दिन २१ गाँठ का लाल धागा हाँथ में बांधकर माता का पूजन करें | घी का दीपक जलावें | भोग लगावें, इस प्रकार पूजन करें | धनन्जय ने कहा हमें भी सूत्र दीजिये और वह सूत्र लेकर घर आ गया | और अपनी पत्नी के साथ २१ दिन तक माता का पूजन  किया | जिससे माता प्रसन्न हुयीं और उनकी जीविका बहुत अच्छे से चलने लगी | दूर - दूर से रिश्तेदार आने लगे और उनके पास खूब धन - दौलत हो गया | और रिश्तदार कहने लगें इतना धन हो और एक भी संतान नहीं, इसलिए अब तुम दूसरा विवाह करो | न चाहते हुए भी धनन्जय को दूसरा विवाह करना पड़ा | नयी बहु के साथ धनन्जय दूसरे घर में जाकर रहने लगा | फिर अगहन मॉस आया तो सुलक्षणा ने धनन्जय से कहा हमें माता की कृपा से यह सबकुछ प्राप्त हुआ है और हमें यह व्रत नहीं छोड़ना चाहिए | सुलक्षणा की यह बात सुनकर धनन्जय घर आ गया और सुलक्षणा के साथ माता की आराधना करने लगा उधर नयी पत्नी धनन्जय की राह देख रही थी | और कई दिन व्यतीत हो जाने पर वो घर आ पहुंची और झगड़ने लगी और धनन्जय को अपने साथ ले गई | नए घर में धनन्जय को निद्रा देवी ने आ घेरा | और नयी बहु ने उसका सूत्र तोड़कर आग में जला दिया | अब क्या था माता का कोप जाग गया सारे घर में आग लग गयी | सुलक्षणा को पता चला तो धनन्जय को अपने घर लेकर आई | और नयी बहु अपने पिता के घर जा बैठी | सुलक्षणा ने कहा स्वामी पुत्र कुपुत्र हो सकता है पर माता कुमाता नहीं | आप फिर जाकर माता के चरणों में क्षमा मांग ले | धनन्जय फिर जंगल की ओर चल पड़ा और चलते - चलते सरोवर के पास पहुंचा | उस सरोवर में उसे सिद्धियाँ दिखीं और वह उस सिद्धियों में उतर चला | अन्दर जाकर क्या देखता है भव्य सोने के सिंघासन पर माता विराजमान हैं | धनन्जय माता की चरणों में गिर पड़ा और रूदन करने लगा | और कहा हे माता हम बहुत बड़े अज्ञानी हैं | हम से भूल हुई है आप हमें क्षमा करें | माता ने उसे उठाया और उठाकर कहा सुलक्षणा ने मेरा व्रत विधिवत किया है मैंने उसे पुत्र रत्न का आशीर्वाद दिया है | सोने की मूर्ती देकर माता ने कहा तुम फिर पूजन करो सबकुछ ठीक हो जाएगा | धनन्जय ने आँखे खोली तो खुद को काशी के अन्नपूर्णा के मंदिर में पाया | वहां से वह घर आया और नौ महीने बाद सुलक्षणा को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई | अब क्या था सारे नगर में खबर फ़ैल गयी | नगर सेठ की कोई संतान नहीं थी | मान्यता मानने पर पुत्र रत्न की प्राप्ति हुयी | तो नगर में माता जी का भव्य मंदी बनवा दिया | और धनन्जय को आचार्य का पद देकर रहने की भी व्यवस्था करवा दी | उधर नयी बहु के घर डाका पड़ा | और पिता पुत्री भिक्षा मांगकर अपना जीवन यापन करने लगे | सुलक्षणा को जब यह बात पता चली तो उसने नयी बहु के लिए अन्न - वस्त्र रहने की व्यवस्था कर दी |

जाकी जैसी भावना, ताको जैसा सिद्ध |

हंसा मोती चुगत है, मुर्दा चिखत गिद्ध |

सत्य भावना देव में, सकल सिद्ध का मूल |

बिना भाव भटक्यो फिरै, खोवे समय फिजूल |

 जय माँ अन्नपूर्णा, सबका कल्याण करें


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