Rahukaal Today/ 15 June 2017 (Delhi)-21 June 2017

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08 अप्रैल, मदन द्वादशी
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चिरंजीवी पुत्र पाने का व्रत

चैत्र मास शुक्ल पक्ष की द्वादशी को मदन द्वादशी का व्रत किया जाता है । इस व्रत में काम पूजन की प्रधानता होती है इसीलिए इसे मदन द्वादशी कहा जाता है । प्राचीन काल में दिति ने अपने दैत्य पुत्रों की मृत्यी के पश्चाात मदन द्वादशी का व्रत करके ही पुत्र रत्न की प्राप्ति की थी...

प्राचीन काल में एक बार देवासुर संग्राम में देवताओं द्वारा संपूर्ण दैत्यकुल का संहार कर दिया गया और माता दिति के सभी दैत्य पुत्र मारे गये । इस पर दिति को बहुत कष्ट हुआ और वह दुखी होकर सरस्वती नदी के तट पर अपने पति महर्षि कश्यप की आराधना करते हुए तपस्या करने लगी । लेकिन सौ वर्षों की कठोर तपस्या के बाद भी उनकी इच्छा पूरी नहीं हुई । तब विफल होकर उन्होंने वसिष्ठ आदि महर्षियों से पुत्र शोक नाशक व्रत अर्थात् जिससे उसके पुत्र की मृत्यु का दुःख कम हो जाये, ऐसे व्रत के विषय में पूछा । तब महर्षि वसिष्ठ ने दिति से मदन द्वादशी व्रत करने का विधान बताया। मदन द्वादशी व्रत का विधान सुनने के बाद दिति ने महर्षियों के निर्देशानुसार व्रत किया और कामदेव व रति की पूजा की । इसी तरह दिति ने प्रत्येक द्वादशी के दिन व्रत व पूजा की और साल की अंतिम, तेरहवीं द्वादशी के दिन व्रत का अनुष्ठान किया । जैसे ही अनुष्ठान पूरा हुआ महर्षि कश्यप दिति के सामने प्रकट हो गए । तब दिति ने उनसे ऐसे पुत्र का वरदान मांगा जो बहुत पराक्रमी हो और देवताओं का वध कर सके । इस तरह महर्षि ने उन्हें छूकर इच्छित वर देते हुए कहा कि तुम्हें पूरे एक हजार वर्ष तक इसी तपोवन में पवित्रता पूर्वक रहना होगा । ऐसा कहकर महर्षि कश्यप अंतध्र्यान हो गए । इस वृतांत को जानकर इंद्र दिति के पास आये और उनकी सेवा करने की इच्छा जतायी, लेकिन उनकी असली मंशा तो यह थी कि किसी तरह दिति का गर्भ नष्ट हो जाये और हुआ भी वैसा ही । दिति के गर्भावस्था के आखिरी दिनों में इंद्र का पैर दिति के सर पर लग गया और वह अपवित्र हो गई। पैर लगने के कारण उनके गर्भ के 7 टुकड़े हो गए, हालांकि गर्भ पर प्रहार के बाद भी शिशु बच गए और एक की जगह दिति के सात पुत्र हुए । तब दिति ने कहा कि मेरे गर्भ के ये टुकड़े हमेशा आकाश मे विचरण करेंगे और मरुत नाम से विख्यात होंगे, लेकिन एक मरुत के सात गण होने के कारण ये उन्नचास हो गए और आकाश में अलग-अलग जगह विचरण करने लगे । तब से ये उन्नचास गण मरुतगण के नाम से विख्यात हो गए । इंद्र को इस बात पर बहुत आश्चर्य हुआ कि ऐसा कैसे हो सकता है परंतु बाद में अपने ध्यान से उन्हें ज्ञात हुआ कि मदन द्वादशी व्रत के प्रभाव के कारण ये बालक अमर हुए हैं । इस तरह मदन द्वादशी के व्रत से दिति को पुत्र की प्राप्ति हुई । इसलिए पुत्र प्राप्ति व सुख-समृद्धि की इच्छा रखने वालों को यह व्रत अवश्य करना चाहिए ।

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