Rahukaal Today/ 09 AUGUST 2017 (Delhi)-15 AUGUST 2017

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होली - 13 मार्च 2017
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जीवन में खुशियां पानी है तो जरूर खेलें होली

फाल्गुन माह की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला देश के प्रमुख त्योहारों में से एक, होली का त्योहार 12 मार्च को है और उसके अगले दिन, यानि 13 मार्च को धुलेंडी है । बसंत पंचमी और महाशिवरात्रि के बाद अगर किसी त्योहार का इंतजार रहता है, तो वो है- होली । आपसी प्यार, मेल-जोल और सद्भावना के प्रतीक के रूप में होली का यह त्योहार हर एक भारतवासी की जान में बसा हुआ है । बसंत ऋतु के आगमन का असली मजा ही होली पर आता है, जब प्रकृति की छटा चारों ओर फैली नजर आती है । चाहे फिर वह आसमान में पक्षियों की चहचहाट में नजर आये या नीचे बसे प्राणियों की मुस्कुराहट में, चाहे कवियों के निराले अंदाज में नजर आये या बच्चों की शरारत में । एक तरह से हम होली को बसंत का औपचारिक दिन कह सकते हैं । जब हर कोई खुलकर आनंद लेता है, झूमता है, गाता है और न जाने क्या-क्या करता है और उसे रोकने टोकने वाला भी कोई नहीं होता । होली का यह त्योहार सिर्फ अभी कुछ समय से ही नहीं, बल्कि प्राचीन काल से चर्चा में है । इसका उल्लेख भारत की पवित्र पुस्तकों, पुराण, दसकुमार चरित, संस्कृत नाटक-रत्नावली जैसी पुस्तकों में मिलता है । होली का वर्णन जैमिनि के पूर्वमिमांसा सूत्र में भी है । कहा जाता है कि होली का यह त्योहार ईसा मसीह के जन्म के कई सदियों पहले से मनाया जा रहा है । प्राचीन काल में होली के साक्ष्य के रूप में आज भी कई मंदिरों और अन्य स्थानों पर होली से संबंधित चित्र व मूर्तियां देखी जा सकती हैं । ऐसा ही एक 16वीं सदी का मंदिर विजयनगर की राजधानी हंपी(अभी कर्नाटक में है) में स्थित है । इस मंदिर के चित्रों में राजकुमार, राजकुमारी अपने दासों के साथ एक दूसरे पर रंग लगा रहे हैं । मध्ययुग के चित्रों में अहमदनगर चित्र, मेवाड़ पेंटिंग, बूंदी के लघु चित्रों में भी होली के अलग-अलग रूपों को देखा जा सकता है । मनुस्मृति में भी इसी दिन प्रथम पुरुष कहे जाने वाले मनु के जन्म का उल्लेख मिलता है । इसके अलावा ‘नर-नारायण’, जिन्हें भगवान विष्णु का चौथा अवतार माना जाता है, के जन्म का वर्णन भी इसी दिन मिलता है । यहां तक कि मुगल काल में भी होली खेली जाती थी । अकबर, हुमायूं, जहांगीर, शाहजहां और बहादुरशाह जफर होली के आगमन से बहुत पहले ही होली की तैयारियां शुरू करवा देते थे। अलवर संग्रहालय के एक चित्र में जहांगीर को होली खेलते हुए दिखाया गया है । अकबर के महल में सोने-चांदी के बड़े-बड़े बर्तनों में केवड़े और केसर से युक्त टेसू का रंग घोला जाता था और राजा अपनी बेगमों और हरम की सुंदरियों के साथ होली खेलते थे। होली का त्योहार मुख्यतः दो दिन तक मनाया जाता है । पहले दिन होलिका पूजन व दहन और अगले दिन धुलेंडी, यानि रंग खेलने की परंपरा है । होली की शुरूआत होली का डांडा गाड़ने के दिन से शुरू हो जाती है । भारतीय परंपरा में होली का डांडा कहीं पर बसंत पंचमी के दिन गाड़ा जाता है तो कहीं-कहीं पर पूर्णिमा के दिन भी रखा जाता है, जिसे होलिका दहन के समय सही सलामत बाहर निकाल लिया जाता है । होलिका दहन और होली का डांडा आग से बाहर निकालने के पीछे भक्त प्रहलाद और हिरण्यकश्यप की बहन होलिका की प्राचीन कहानी है । प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था । अपने बल के घमंड में वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा था । उसने अपने राज्य में भी ईश्वर का नाम लेने पर पाबंदी लगा दी थी, लेकिन हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद ईश्वर का परम भक्त था । प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकश्यप ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने ईश्वर की भक्ति नहीं छोड़ी । आखिर में हिरण्यकश्यप ने उसे मारने की एक तरकीब सोची । उसकी बहन होलिका को आग में भस्म न होने का वरदान प्राप्त था। हिरण्यकश्यप ने होलिका से प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठने को कहा, लेकिन वरदान प्राप्त होने के बाद भी होलिका आग में जल गई और विष्णु भक्त प्रह्लाद बच गया । इस तरह बुराई पर अच्छाई की जीत हुई और तभी से होलिका दहन और प्रहलाद के प्रतीक स्वरूप होली के डांडे को बाहर निकालने की यह परंपरा चली आ रही है । माना जाता है कि हर बार होली जलाने से हमारे अंदर की सारी बुराईयां और समाज में फैली नकारात्मकता खत्म हो जाती है । प्रह्लाद की कथा के अतिरिक्त यह पर्व पूतना राक्षसी के वध, राधा-कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी जुड़ा हुआ है । होली के डांडे के साथ ढेर सारी लकड़ियां व उपले भी डाले जाते हैं, ताकि आसानी से होलिका दहन हो सके । होली के दिन घर की महिलाएं होलिका पूजन के लिये जाती हैं । पूजन के लिये एक लोटे में शुद्ध जल, रोली, अक्षत, फूल, धूप-दीप, बेर, सामग्री के चारों ओर घेरे के लिये आटा और सूत का धागा ले जाया जाता है । सबसे पहले सारी सामग्रियों से होलिका की पूजा की जाती है और जल चढ़ाया जाता है । इसके बाद कच्चे सूत के धागे को होलिका के चारों ओर तीन या सात परिक्रमा करते हुए लपेटते हैं । पूजन सामग्री के अलावा होलिका पर गोबर से बना नारियल और सूरज, चांद-सितारे, बिड़कुले, ढाल आदि से बनी माला चढ़ाई जाती है । होलिका पर चढ़ाने के अलावा तीन मालाएं और बनाई जाती हैं । एक माला पितरों के नाम की, दूसरी हनुमान जी की, तीसरी शीतला माता और चौथी घर के नाम की बनाई जाती है । इसके बाद शाम को आस-पास के घर-परिवारों के लोग होलिका दहन के लिये इकट्ठे होते हैं । होलिका दहन के समय कच्चे आम, नारियल, सतनाज, चीनी के खिलौने, नई फसल आदि की आहुति दी जाती है और एक लोटा पानी में कुमकुम, हल्दी, चावल डालकर जलती हुई आग के चारों ओर डालते हुए परिक्रमा की जाती है और सब लोग नयी हरी गेहूं की बाली आग में भूनकर उसका प्रसाद खाते हैं और सबको बांटते हैं । होली की राख को अगली सुबह, यानि धुलेंडी के दिन लोग अपने शरीर पर भी लगाते हैं। होलिका दहन केवल एक परंपरा नहीं है, बल्कि इसका एक वैज्ञानिक आधार भी है । वैज्ञानिक रूप से होलिका दहन वातावरण को स्वच्छ व सुरक्षित बनाता है । पूरे देश में विभिन्न स्थानों पर होलिका दहन की इस प्रक्रिया से वातावरण का तापमान 145 डिग्री फारेनहाइट तक बढ़ जाता है जो सर्दियों और बसंत के मौसम के कारण पनपे अनगिनत बैक्टीरियाओं को मारता है और जब हम होलिका के चारों ओर परिक्रमा करते हैं तो हमारे शरीर के अंदर पनप रहे बैक्टीरिया भी मर जाते हैं । होलिका के जल जाने के बाद कई लोग चंदन और नए आम के पत्तों को उसकी राख के मिश्रण के साथ अपने माथे पर लगाते हैं, यह क्रिया स्वास्थ्य को बढ़ाने में मदद करती है । होली दहन की रात को सब एक-दूसरे को गुलाल से शगुन का टीका लगाते हैं । ये टीका इस बात प्रतीक होता है कि अब रंग खेलने की परंपरा, यानि धुलेंडी की शुरुआत हो चुकी है । इस तरह होलिका पूजन के अगले दिन धुलेंडी पर सब एक-दूसरे को रंग-गुलाल लगाकर बधाई देते हैं । धुलेंडी के ये रंग केवल हमें लुभाते नहीं है बल्कि हमारे मन और शरीर पर प्रत्यक्ष रूप से असर भी डालते हैं । धुलेंडी को धूलि वंदन भी कहा जाता है। भारत देश के विभिन्न हिस्सों में होली को अलग-अलग नामों से जाना जाता है । तमिलनाडु में होली को प्रेम के प्रतीक रूप में ‘कमाविलास’, ‘कमान पंदिगाई’ एवं ‘काम दहन’ के नाम से जाना जाता है । होली की परंपरा के पीछे यहां के लोगों का मानना है कि शिव और पार्वती के विवाह के समय कामदेव के तीर के लगने से क्रोधित शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था, तब कामदेव की पत्नी रति के आग्रह पर शिवजी ने उन्हें पुनर्जिवित कर दिया था। इस तरह से कामदेव के पुनर्जिवित होने के दिन को ही यहां होली के रूप में मनाया जाता है । बंगाल में होली को ‘डोल यात्रा’ व ‘डोल पूर्णिमा’ कहते हैं क्योंकि होली के दिन यहां राधा-कृष्ण की प्रतिमाओं को डोली में बैठाकर पूरे शहर में घुमाने की परंपरा है । उड़ीसा में भी होली को ‘डोल पूर्णिमा’ कहते हैं, लेकिन यहां भगवान जगन्नाथ जी की डोली यात्रा निकाली जाती है । राजस्थान में होली मुख्यतः तीन प्रकार की होती है । माली होली- इसमें माली जाति के पुरुष महिलाओं पर पानी डालते हैं और बदले में महिलाएं उन्हें लाठियों से पिटती हैं । इसके अलावा गोदाजी की गैर होली और बीकानेर की डोलची होली भी बेहद खूबसूरत होती हैं । पंजाब में होली को ‘होला मोहल्ला’ कहते हैं । इस मौके पर घुड़सवारी व तलवारबाजी का आयोजन किया जाता है । हरियाणा में होली को धुलेंडी ही कहा जाता है । कर्नाटक में इसे ‘कामना हब्बा’ के रूप में मनाया जाता है । इस दिन कूड़े-करकट व फटे वस्त्रों को एक खुली जगह पर इकट्ठा करके अग्नि को समर्पित किया जाता है । इसके अलावा बिहार में होली को ‘फगुआ होली’, गुजरात में ‘गोविंदा होली’ और पश्चिमी पूर्व में ‘बिही’ जनजाति की होली के नाम से जाता है । इसके अलावा उत्तरप्रदेश में ‘लठमार होली’, असम में ‘फगवाह’ या ‘देओल’, बंगाल में ‘ढोल पूर्णिमा’ के नाम से होली का त्योहार मनाया जाता है ।

राशिअनुसार रंगों से खेलें होली

होली के दिन किस रंग के कपड़े पहनना और किस रंग से होली खेलना आपके लिये रहेगा शुभ और यह भी जानें इस दिन क्या दान करना आपके लिये रहेगा अच्छा...

मेष- राशि वालों के लिए लाल या मैरून रंग के कपड़े पहनकर लाल रंग से होली खेलना शुभ है । इस दिन मसूर की दाल से बनी कोई चीज दान करें और होली खेलकर नहाने के बाद नये कपड़े पहनकर घर के मंदिर में भगवान का आशीर्वाद लें ।

वृष- राशि वालों को इस दिन सफेद या आसमानी रंग के कपड़े पहनकर नीले रंग से होली खेलनी चाहिए । इस दिन अपनी कोई भी एक पसंदीदा मिठाई दान करें और होली खेलने के बाद गणेश जी के दर्शन करें ।

मिथुन- राशि वालों के लिए सिंथेटिक हरे रंग के कपड़े पहनकर हरे रंग से ही होली खेलना अच्छा रहेगा । इस दिन मूंग की दाल से बनी कोई चीज दान करें ।

कर्क- राशि वालों को कॉटन से बने सफेद या हल्के गुलाबी रंग के कपड़े पहनकर गुलाबी रंग से होली खेलनी चाहिए। इस दिन दूध से बनी कोई चीज दान करें ।

सिंह- राशि वालों इस दिन ऑरेंज या सफेद रंग के कपड़े पहनकर आरेन्ज रंग से होली खेलें । इस दिन कोई गरमा-गरम या चटपटी चीज दूसरों को खिलाएं । सिन्दूर का टीका मस्तक पर लगाना न भूलें।

कन्या- राशि वालों को इस दिन हरे रंग के कॉटन के कपड़े पहनकर हरे रंग से खेलना चाहिए । यह रंग आपको सकारात्मक ऊर्जा देगा । इस दिन आप पिस्ते से बनी कोई मिठाई दान करें ।

तुला- राशि वालों के लिए इस दिन आसमानी या सफेद रंग के सिल्क के कपड़े पहनकर नीले रंग से होली खेलना अच्छा रहेगा । इस दिन दही या मलाई से बनी कोई चीज दान करें ।

वृश्चिक- राशि वालों इस दिन आप मैरून या ब्राउन रंग के कपड़े पहनकर मैरून रंग से होली खेलें । इस दिन आप कोई चटपटी या तीखी चीज खाएं और अपने मित्रों को भी खिलाएं । सर पर टोपी लगाना या पगड़ी बांधना आपके लिए विशेष शुभदायक है ।

धनु- राशि वाले इस दिन केसरिया रंग के कपड़े पहनकर पीले रंग से होली खेलें । इस दिन केसर से बनी कोई मिठाई या फिर गुंझिया दान करें ।

मकर- राशि वाले इस दिन सिन्थेटिक ब्लू या भूरे रंग के कपड़े पहनकर नीले रंग से होली खेलें । इस दिन काली मिर्च से बनी कोई चीज दान करें ।

कुंभ- राशि वालों के लिए इस दिन काले रंग के कपड़े पहनकर जामुनी रंग से होली खेलना शुभ है । इस दिन दही बड़े या कोई ऐसी चीज जिसमें काला नमक उपयोग में आता हो, खुद खाएं और दूसरों को भी खिलाएं ।

मीन- राशि वाले इस दिन गोल्डन रंग के सिल्क के कपड़े पहनकर पीले रंग से होली खेलें । इस दिन बेसन से बनी कोई मिठाई दान करें । होली खेलने के बाद नये कपड़े पहनकर थोड़ा-सा गुड़ जरूर खाएं ।

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Holi- A Festival of Colours

Holi is one among most famous festivals. This year, it will fall on 12th March whereas Dulhandi will fall on 13th of March. All people wait for Holi after the famous festivals of Basant Panchami and Mahashivratri. The festival is celebrated with great enthusiasm and brings even rivals closer, it brings intimacy between them. It brings mutual affection, understanding and harmony among the people. The festival is seated deep inside the soul of all Indians. The actual enthusiasm of spring can be heartily felt only during the festival of Holi. During this festival, natural beauty is explicitly seen all over. You can observe optimism all over whether it is in nature in the form of twittering of birds in sky or smiles on the faces of humans on earth; the naughtiness of kids or the verses or poems written by poets. During this time, everyone enjoys, sings, dances and hops around freely. People want to enjoy to their maximum. They do not want to get bothered about anything. The festival of Holi has always been a talk of the town across the world from eternal era. It has been broadly described in our pious scriptures, books, Daskumar Charit and Sanskrit Natak Ratnawali like books. The description of Holi has also been beautifully discussed in Purvamimansa Sutra in Jaimini and in Kathak Grahay Sutra. It is said that the festival of Holi is being celebrated many years before the birth of Lord Isa Maseeh. Many temples beautifully describe the festival of Holi in the form of carvings and images of Holi pictures. These temples were constructed during ancient ages. One such temple is located in the capital of Vijaynagar called Humpi (which is now in Karnataka) constructed during the 16th era. One can see that prince and princess are applying colours on the body of their servants. In the pictures of middle ages, one can see various other kinds of paintings. Some of the famous ones are Ahmadabad painting, Mevar painting and some paintings of Bundi where you can see its varied kinds. Manu took birth on this day; states our scripture Manusmriti. Apart from this, Nar-Narayan who is the fourth avatar of Lord Vishnu was also born on this day. Surprisingly, Holi was also played during the Mughals. Akbar, Humayu, Jahangir, Shah Jahan and Bhadurshah Zafar used to undergo prior preparations long time back before the arrival of Holi. One can see an image of Jahagir playing Holi in the museum of Alwar. In the kingdom of Akbar, huge utensils were used to prepare kewra and tesu colours used to play Holi. The king used to enjoy a lot with his all queens and other Haram beauty queens. The festival of Holi is primarily celebrated for two days. First day is for Holika Pujan and the next day is celebrated as Dhulendi which means playing with colours. Holi begins with fixing a rod. In Indian culture, this rod is fixed on some places during Maagh Purnima whereas on other places it is fixed on Basant Panchami. However, this rod is successfully taken out on the day of Holika Dahan .The rod is taken out as the fire is lit. It is ensured that the rod is not harmed with fire. Behind all this, is the famous story of Hirankashyap's sister and Prahlad. In the ancient time, there a was a powerful king popular by the name of Hirankashyap. He was a cruel demon. Since he was physically powerful, he started imagining himself as God. He told everyone in his kingdom that no one will worship the God but will revere him only, but the son of Hirankashyap was a great follower of God and had a blind faith. He did not accept his rule. Hirankashyap became very angry and punished him severely; but Prahlad did not left worshipping the God. Finally, Hirankashyap thought of killing Prahlad. His sister was blessed with a boon that she will not be harmed by fire. Hirankashyap ordered Holika to sit in the mid of the fire after taking Prahlad in her lap, but even after being blessed with a boon, she got burnt. The story states the victory of goodness over evil. Only after that, the tradition of taking out the rod from the fire is followed. It is believed that every time by burning Holika , we bring an end to all our evils and burn the negativity  spreading in the society. Apart from the story of Prahlad, the festival celebrates the slaughter of lady monster Putna. It also commemorates the raas-leela of Radha- Krishna and the rebirth of Kaamdev. With the rod of Holi, people put lot of wooden pieces and cowdung too so that Holika Dahan can be performed with eminent ease. After the rod is established, all the ladies of the house worship at the place of Holika Dahan.  They carry a pure water in a kalash, roli, akshat, flowers, incensed agarbattis, plum fruit, grinded flour, soot (a cotton thread) etc. With grinded flour a line is drawn around the gathered woods, During reverence all the items are used to revere the Holika and thereafter jal is offered on the place of worship. Thereafter with raw cotton thread, the ladies perform three to seven parikrama and soot is swaddled around the kept woods. Apart from using the Pujan samagri, ladies also offer coconut, moon, sun, stars, birkoole, gas, gas fire, mill, protective shield etc. All these items are made up of cow dung. Holika is also offered 3 garlands made up of flowers and there is one garland that is kept separately. The first garland is for our pitras, the second garland is for Hanumanji and the third garland is for Goddess Sheetala and the fourth garland is for the native's own house. Thereafter, people of different families gather around their neighbourhood for Holika Dahan in the evening. At the time of Holika Dahan, raw mangoes, coconut, seven types of cereals, sugar toys and new grains are offered to the Holika. Also, some turmeric powder is added to the kalash and aahuti is given around at the time of Holika dahan and parikrama is performed. People roast new cultivated grains in fire and distribute it as prasaad. Some people even bring that fire to their home and roast papad on it and eat it as prasaad. Some people apply the ash of Holika Dahan on their body before taking shower the next morning on Dhulendi. Holika Dahan is not merely a tradition but it has a scientific base. Scientifically, it keeps our environment clean and safe. In our country on different places, the temperatures rises to 145 degree Fahrenheit. It prevents many harmful viruses and bacteria from multiplying. When we perform parikrama around the Holika Dahan, many of the bacteria present in our body die. After Holika is fired and ash is produced many people apply the ash of sandal and new banana leaves on their forehead. This activity improves our health. On the night of Holika Dahan people apply 'shagun ka gulal' on the face of each other. This symbolises that one is free to play with vibrant colours now. This way on the next day of Holika Dahan on Dhulendi, all people congratulate each other by playing with Gulal. They sing and dance together. These vibrant colours of Gulal not only attract us from a distance but affects our body and mind directly. Dhulendi is also known as “Dhuli Vandan”. Holi is called by different names in different parts of the country- In Tamilnadu, it is named as 'Kamavilas', 'Kaman Pandigayee', and 'Kaam Dahan'. It is the symbol of love. Behind the Holi traditions, there is a popular story of Kaamdev which states that at the time of marriage ceremony of Lord Shiva and Pravati, a bow was released by Kaamdev which made Lord Shiva very angry and he turned Kaamdev into ashes. Then the wife of Kaamdev requested him to make him alive and Lord Shiva did so too. The day Kaamdev was alive; it is celebrated as Holi on this place. In Bengal, Holi is named as 'Dol Yatra' or ' Dol Purnima'. It's because on this day, the idols of Radha and Krishna are taken out for procession and strolled in the city. In Orissa, Holi is termed as 'Dol Purnima' but instead of idols of Radha–Krishna, the procession of Lord Jagannath is taken for stroll. In Rajasthan, Holi is of three types. Mali Holi- In which the people of Mali creed throw or sprinkle water on the females and women in return beat them with rods. Apart from that 'The 'Gaer Holi of Godaji' and 'The Dolchi Holi of Bikaner' are also exceptionally beautiful. In Punjab, Holi is termed as 'Dolchi Holi'. Horse riding and sword fighting like competitions are organised in Punjab on the occasion of Holi. In Haryana, Holi is termed as Dhulendi. In Karnataka, Holi is termed as ' Kamna Habba'. On this day, people collect all the torn clothes, empty bottles and waste materials and offer them to fire to spread cleanliness around. Apart from this in Bihar, Holi is termed as 'Fagua Holi', it is termed as 'Govinda Holi' in Gujarat,' Bihi Holi' in West and East part of India. It is famous by the name of 'Lathmaar Holi' in Uttar Pradesh, 'Fagwah' or 'Deol' in Assam and in Bengal it is termed as 'Dhol Purnima'. In short, the festival of Holi is celebrated with lots of pomp and show across the India.

Colours to be used this Holi based on Zodiac Signs

Aries- Ariens should wear red coloured clothes and then play Holi. It will bring auspicious results. They should donate something made up of masoor dal. After playing Holi, they should seek the blessings in house temple after wearing fresh and new clothes.

Taurus- Taurans should play Holi with blue colour after wearing white or sky blue coloured clothes. You should donate any of your favourite sweets. Do the darshan of Lord Ganesha after playing Holi. 

Gemini- Gemini should wear synthetic green coloured clothes and then play Holi. Donate something made up of moong ki daal. Cancer- Cancerians should wear white coloured cotton clothes or pink coloured clothes and then play Holi. Donate some item made up of milk. 

Leo- People with Leo zodiac sign should play Holi after wearing orange or white coloured clothes. Serve something hot and spicy dishes to other natives. With this do not forget to apply Holi teeka on the forehead after playing Holi.

Virgo- Virgo should wear green cotton clothes and then play with colours. This colour with bless you with optimistic energy. Donate some item made up of pistachio nuts. 

Libra- Librans should play with colours after wearing sky blue or white coloured clothes. Donate something made up of cream or curd.

Scorpio- They should wear maroon or brown coloured clothes and play Holi with maroon colour. They should eat something hot and spicy and serve the same to their friends too. Wearing a cap or 'pagari' on the head will bring auspicious results. 

Sagittarius- These natives should wear orange (saffron) coloured clothes and play Holi with yellow colour. They should donate something made up of saffron or 'Gujjiya'.

Capricorn- Capricorns should play Holi after wearing synthetic blue or brown coloured clothes. Donate something made up of black pepper. 

Aquarius- Violet or black coloured clothes should be worn on this day to play Holi. Eat yourself and serve to other Dahi- bara. Ensure that rock salt (kala namak) is used to prepare the dish.

Pisces- They should play Holi with yellow colour after wearing golden coloured silken clothes. Donate some sweet made up of gram floor (Besan). After playing Holi and after taking shower, ensure that you eat some jaggery for getting auspicious results.

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