Rahukaal Today/ 09 AUGUST 2017 (Delhi)-15 AUGUST 2017

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होलाष्टक - 05 मार्च 2017
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होलाष्टक

शास्त्रों में फाल्गुन माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी से लेकर चैत्र कृष्ण पक्ष में होलिका दहन तक की अवधि को होलाष्टक कहा गया है । होलाष्टक शब्द होली और अष्टक दो शब्दों से मिलकर बना है । यहां पर अष्टक का मतलब है आठ, यानि कि होली के आठ दिन पहले से इसकी शुरुआत हो जाती है और होली के अगले दिन, यानि धुलेंडी पर इसका समापन होता है । होलाष्टक लगने के दिन से होली की तैयारियां भी तेज हो जाती हैं । होलिका दहन के लिये गोबर के बिड़कुले(उपले) भी इसी दिन बनाए जाते हैं और बाजारों में भी होली की तैयारियां जोरों से होने लगती है। रंग बिरंगी पिचकारियों, गुब्बारे और रंगों से पूरा बाजार सजा नजर आता है । इस दिन से होली की तैयारियां तो तेज हो जाती हैं, लेकिन शास्त्रों में फाल्गुन की अष्टमी से लेकर होलिका दहन तक, होलाष्टक के इन आठ दिनों में किसी भी तरह का शुभ कार्य करना वर्जित माना जाता है । विशेष रूप से इस समय विवाह, गृह प्रवेश, नया निर्माण या अन्य कोई नया काम आरंभ नहीं करना चाहिए । अन्यथा इन दिनों में किए गए कार्यों से कष्ट व अनेक पीड़ाओं की आशंका बनी रहती है। हालांकि कुछ शांति उपायों के साथ किसी के जन्म और मृत्यु के पश्चात् किए जाने वाले कृत्यों की मनाही नहीं की गई है । इन वर्जित कार्यों में कुल 16 संस्कार दिए गए हैं । इन 16 संस्कारों में से एक भी संस्कार को होलाष्टक के दौरान करने की मनाही है।

होलिका दहन मुहूर्त-

शाम 06:23 से 08:23 तक, अवधि- 1घंटा 59 मिनट

                       भद्रा पूंछ- शाम 04:11 से 05:23 तक, भद्रा मुख- 05:23 से 07:23 तक

 

सोलह संस्कार

गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोन्नायन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, कर्णवेध, उपनयन, वेदारंभ, केशांत, समावर्तन, विवाह, सन्यास, अंत्येष्टि

माना जाता है कि होलाष्टक के इन आठ दिनों में क्रमशः अष्टमी को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल तथा पूर्णिमा को राहु उग्र रूप लिए हुए रहते हैं, जिसके चलते यह अवधि अशुभ मानी गई है और मांगलिक कार्यों पर इन दिनों विराम लग जाता है । होलाष्टक को मनाने के पीछे प्रचलित मान्यता के अनुसार शिव और पार्वती के विवाह के समय कामदेव के तीर के लगने से, अपनी तपस्या भंग होने पर क्रोधित शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था । कामदेव प्रेम के देवता माने जाते हैं, इसलिए उनके भस्म होने पर पूरे संसार में शोक की लहर फैल गई और सारे शुभ काम होने बंद हो गए थे । तब होली के अगले दिन कामदेव की पत्नी रति के क्षमायाचना करने पर शिवजी ने उन्हें पुनर्जिवित कर दिया था और लोगों ने इस बात की बहुत खुशी मनाई । इस तरह से कामदेव के पुनर्जिवित होने के दिन, यानि धुलेंडी के दिन होलाष्टक की समाप्ति होती है । होलाष्टक की यह परंपरा मुख्यतः उत्तर भारत में अधिक निभाई जाती है, जबकि दक्षिण भारत में यह परंपरा कम ही देखने को मिलती है ।

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