Rahukaal Today/ 09 AUGUST 2017 (Delhi)-15 AUGUST 2017

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गुरु पूर्णिमा - 9 जुलाई 2017
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गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढै़ खोट

अंतर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट ।।


हमारा भारत देश अनेक परंपराओं का साक्षी रहा है । इन्हीं परंपराओं में से एक है गुरु-शिष्य परंपरा । प्राचीनकाल से ही भारत देश महान गुरु और उनके शिष्यों की जन्मस्थली रहा है । गुरु भारतीय संस्कृति का एक अहम हिस्सा हैं और उस संस्कृति को याद रखने के लिये ही आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा का नाम दिया गया है । गुरु पूर्णिमा के सापेक्ष में यह भी माना जाता है कि इसी दिन वेद व्यास जी ने वेदों का संकलन किया था और कई पुराणों, उपपुराणों व महाभारत की रचना भी इसी दिन पूर्ण हुई थी । इसलिए इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है ।

गुरु पूर्णिमा सभी गुरुओं को याद करने का, उन्हें नमन करने का दिन है । शास्त्रों में गुरु को भगवान से भी ऊंचा दर्जा दिया गया है । गुरुओं के बारे में स्वयं भगवान शिवजी कहते हैं-

गुरुर्देवो गुरुर्धर्मो, गुरौ निष्ठा परं तपः । गुरोः परतरं नास्ति, त्रिवारं कथयामि ते ।। (श्री गुरुगीता श्लोक 152) अर्थात् गुरु ही देव हैं, गुरु ही धर्म हैं, गुरु में निष्ठा ही परम धर्म है । गुरु से अधिक और कुछ नहीं है और यह मैं तीन बार कहता हूं । आपको ज्ञात होगा भगवान शिव भी किसी न किसी के ध्यान में लगे रहते हैं, यानी उनसे भी बड़ा कोई है जो उन्हें मार्गदर्शन देता है और जिनकी शरण में वे अपना मस्तक झुकाते हैं । भगवान कृष्ण ने भी ज्ञान के लिये गुरु सांदीपनि का आश्रय पाया था । गुरु सब कुछ है । गुरुत्व प्राणियों का आधार है । कहते हैं ‘हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहिं ठौर’ अर्थात् भगवान के रूठने पर तो गुरु की शरण मिल जाती है, परंतु गुरु के रूठने पर कहीं भी शरण नहीं मिल पाती । एक गुरु आत्मज्ञानी, आत्मनियंत्रित, संयमी और अंतर्दृष्टि से युक्त होता है जो अपने शिष्य की कमजोरी, ताकत, उसकी बुद्धि को भलीभांति पहचानकर ही उसे शिक्षा प्रदान करता है ताकि अपने ज्ञान के क्षेत्र में उसे कोई पराजित न कर सके । ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार एक कुम्हार घड़ा बनाने के लिये मिट्टी में से कंकड़ों को निकालकर उसे घड़ा बनाने के लायक बनाता है और फिर उसे मिट्टी से घड़ा बनाने के बाद हाथ का सहारा देते हुए बाहर से थाप देकर उसे मजबूत बनाता है ।

गुरु हमारे जीवन का मार्गदर्शक होता है जो हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है और वास्तविकता से हमारी पहचान करवाता है । आत्मा-परमात्मा संबंधी ज्ञान गुरु के सहारे ही प्राप्त किया जा सकता है । किताबों के ज्ञान से कोई अच्छा उपदेशक तो बन सकता है, लेकिन गहराई में जाकर हीरे-मोती निकालने का ज्ञान गुरु ही देता है । गुरु अपने शिष्य में एक नयी और सकारात्मक सोच का संचार करता है । इंसान के सारे नाते सामाजिक बंधन के कारण जुड़ते हैं, लेकिन शिष्य और गुरु का नाता मन से जुड़ा होता है । यह एक ऐसा अनूठा रिश्ता है जिसमें न केवल एक अच्छा गुरु पाकर शिष्य, बल्कि एक अच्छा शिष्य पाकर गुरु भी धन्य हो जाता है । एक सच्चा गुरु हमेशा शिष्य को अपने से भी ज्यादा श्रेष्ठ बनाने की कोशिश करता है । गुरु अपने शिष्य को एक माली की तरह सींचता है । जब शिष्य गुरु के पास दीक्षा लेने जाता है तो उस समय वह एक छोटे से बीज के समान होता है, लेकिन गुरु के सानिध्य में आने के बाद शिष्य धीरे-धीरे एक विशाल वृक्ष का रूप धारण कर लेता है । बड़ा होने पर वही वृक्ष दूसरों को छाया देने का काम करता है, यानी एक सच्चा शिष्य अपने गुरु के विचारों को आगे बढ़ाता है । गुरु अपने शिष्य को हमेशा एक कलम की तरह विनम्रता से काम करना सिखाता है । कलम हमेशा झुक कर काम करती है और आगे बढ़ती रहती है । कलम हमें रचना सिखाती है, बिगड़ी चीजों को सुधारना सिखाती है ।

वर्तमान में गुरु की तलाश - यह भी सत्य है कि एक सच्चे गुरु का शिष्य बनने के लिये समर्पण का भाव होना बेहद जरूरी है । गुरु का ज्ञान वही पा सकता है जो उसे पाने की इच्छा रखता हो । आपने वो कहावत तो सुनी होगी कि प्यासा कुएं के पास जाता है, कुआं प्यासे के पास नहीं । जिसे जल की लालसा होगी वह कुएं के पास अवश्य जायेगा, लेकिन आज के समय में पानी वाला कुआं ढूंढ़ना भी बड़ा काम है । जिस प्रकार रेगिस्तान में जगह -जगह मृगतृष्णा या मरीचिका राहगीर को पानी के लालच में अपनी ओर खिंचती है, लेकिन असल में वहां कोई पानी नहीं होता और पानी की तलाश में फिर से कोशिश करनी पड़ती है, परंतु जब पानी मिलता है तो अद्भुत तृप्ति मिलती है । ठीक इसी तरह गुरु की तलाश भी करनी पड़ती है । वर्तमान में अनेक गुरु मिलते हैं जो सच्चे ज्ञान का रास्ता बताने की बातें करते हैं, लेकिन उनमें से सही कौन है ? कौन आपको सही राह पर ले जायेगा ? कहां आपकी तलाश पूरी होगी ? यह कह पाना मुश्किल है । हालांकि आज भी कई ऐसे सच्चे और ज्ञानी गुरु हैं जो जीवन में आपका मार्गदर्शन करते हैं, लेकिन उन तक पहुंचने के लिये तलाश आप ही को करनी होगी । यहां एक कहावत है ‘गुरु करो जान के, पानी पियो छान के’ । क्योंकि सच्चे गुरु का तो स्पर्श मात्र ही तुम्हारे अंदर संगीत की धारा प्रवाहित कर देगा ।

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Guru kumhar shish kumbh hai, gadhi gadhi kaadhe khot

Antar haath sahaar dae, bahar baahe chot

Our country has wintnessed many traditions. One of these traditions is the  Guru-Shishya tradition. From the ancient times, India has been the birthplace of great Gurus and their disciples. Gurus have been an important part of Indian culture and to remember this tradition, the full-moon night of Ashaadh month has been named as Guru Poornima. In relation to Guru Poornima, this is also considered that on this day Ved Vyas compiled the Vedas, and many Puranas, Uppuranas and Mahabharata also came into existence on this day. This is the reason why this day is also known as Vyas Poornima.

Guru poornima is the day of remembering and paying respect to all the Gurus. In Shastras, Guru is given a place even higher than the Gods. With respect to Gurus, the Lord Shiva himself says-  Gururdevo Gururdharmon, Guru Nishtha Par Tapah Guru PartaranNasti, Trivaram Kathyami Te. (Shri Gurugeeta Shloka 152)

Meaning, Guru is the lord, Guru is religion, and dedication to the Guru is the ultimate duty. There is nothing greater than the Guru. And I say this three times. You must be aware of the fact that Lord Shiva is always meditating. Therefore, there could be a greater force than him which guides him and to which he bows his head head. Similarly, Lord Krishna also went to Guru Sandipani for gaining knowledge. Guru is everything. Gurutva is the basis of every living being. It is said 'Hari Roothey Guru Thaur Hai, Guru RootheyNahiThaur', meaning when the Lord is upset with you, you can go to the guru. But if the Guru gets upset, you have nowhere to go. The Guru is self-knowledgeable, self-disciplined, patient and has great foresight which allows him to judge the cognitive and physical abilities of his Shishya; enabling him to provide the right educations and skills to his shishya. So, the shishya cannot be defeated in the domain of the knowledge he has gained. The same way a potter plucks out pebbles from the clay in order to make a pot and then gives support of his hand from the outside to make the pot firmer and stronger. Guru is the guide of our life who shows us the right path from darkness to light and introduces us to the reality. The great knowledge of divinity can be learnt with the help of a Guru. With the knowledge of books, one can be a good preacher. But to get in depth and attain pearls of true wisdom can be possible with the help of a Guru. Guru inspires the growth of a new and positve thinking in the Shishya. All the relations of a person are bound to the societal periphery, but the relation of Guru and Shishya forms from the heart. This is one great relation wherein finding his Guru not only is the Shishya grateful but vice-versa. A true Guru aims to make the Shishya even greater than himself. Guru takes care of the Shishya like a gardener takes care of a plant. When the Shishya goes to the Guru to seek knowledge, he is like a seed, but under the guidance of his Guru, the same Shishya slowly transcends into a big tree. A tree that provides shadow to the others; meaning a true Shishya propagates the teachings of his Guru. Guru teaches his Shishya to work with dignity, like a pen. The way a pen keeps it point down and continues forward. The pen teaches us creation and how to fix things which are deteriorting the search of Guru in the present, This is also true that to become a Shishya of a true Guru, one must have the feeling of dedication. Only person to really receive the teachings of the Guru, is the one who truely desires it.You must have heard of the saying that the one who is thirsty, comes to the well and not the other way. One who is looking for water, he definitely will go to the well, but in today's world it's quite a task to find a well with water in it. Like the way, a mirage attracts a thirsty person in a desert towards itself but there's no water and one has to begin his search of the water again. But once you find water, the satisfaction is immense. The same way one has to keep looking for a Guru. In today's world, you'll find many Gurus who claim to the right path of true knowledge, but who amongst them is actually the right one? Who would take you on to the right path? Where will your search end? To tell this, is difficult. Still, there are many knowledgeable and true Gurus who can guide you in your life, but you'll have to keep searching to find them. There is a saying to it: 'Guru KaroJaanKe, Paani Piyo Chhaan Ke'. For the touch of a true Guru would spread a stream of music in you.

 

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