Rahukaal Today/ 09 AUGUST 2017 (Delhi)-15 AUGUST 2017

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शीतला अष्टमी - 21 मार्च 2017
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ऊँ हृीं श्रीं शीतलायै नमः

शीतला अष्टमी पूजन- सुबह 08:19 से शाम 06:28 तक, अवधि- 10 घंटे 09 मिनट


शीतला अष्टमी का पर्व भारत देश के हर कोने में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है । इस पर्व में शीतला माता की पूजा की जाती है । कोई माघ शुक्ल पक्ष की षष्ठी को शीतला माता की पूजा करता है तो कोई वैशाख कृष्ण पक्ष की अष्टमी को, तो कोई चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी या अष्टमी को शीतला मां की पूजा करता है । वैसे तो शीतला मां की पूजा अलग-अलग जगहों पर, विभिन्न तारीखों पर, सब अपने रीति-रिवाज़ों के अनुसार करते हैं, लेकिन चैत्र माह की इस शीतला अष्टमी का विशेष महत्व है । हर साल फाल्गुन में होली के त्योहार के बाद शीतला अष्टमी का पर्व मनाया जाता है । शीतला अष्टमी के पर्व को बूढ़ा बसौड़ा, बासौड़ा, और बसियौरा नामों से भी जाना जाता है। शीतला अष्टमी के इन सब नामों के पीछे तर्क है कि शीतला अष्टमी के दिन बांसा या ठण्डा खाना खाया जाता है। शीतला अष्टमी का पर्व हमारे देश में विशेषकर मालवा, निमाड़ और राजस्थान में मनाया जाता है।

शीतला अष्टमी के दिन रास्ते के पत्थर को देवी का स्वरूप मानकर पूजा जाता है । इसलिए शीतला माता को पथवारी माता के नाम से भी जाना जाता है । पथवारी माता का अर्थ होता है कि जिस रास्ते से हम जाते हैं, उस रास्ते की देवी शीतला माता, यानि पथवारी माता हैं । शास्त्रों के अनुसार, इस दिन हम रास्ते के पत्थर को इसलिए पूजते हैं ताकि हम अपने रास्ते से कभी ना भटकें और हमेशा कहीं भी जाते वक्त हम सुरक्षित रहें । पूजा स्थल के आस पास एक दिन पहले ही साफ-सफाई की जाती है और देवी मां के पत्थर को साफ पानी से धोया जाता है । ऋतु परिवर्तन होने से मौसम में भी कई तरह के बदलाव होते हैं जो स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालते हैं। अतः इन बदलावों से बचने के लिए विषेश ध्यान रखना बेहद जरूरी होता है ।

गांवों में आज भी चेचक की बीमारी का इलाज शीतला मां की पूजा को ही माना जाता है । शीतला माता अपने हाथों में कलश, झाडू और सूपड़ा धारण किए रहती हैं । चेचक के मरीज की सबसे पहले सूपड़े से हवा की जाती है । इसके बाद माता के गले में धारण नीम की पत्तियों से उनको झाड़ा जाता है । जिससे चेचक के दाग दूर हो जाते हैं।

शीतला अष्टमी के दिन ठंडा या कहें बासी खाना खाने का रिवाज है । शीतला अष्टमी से एक दिन पहले घर की महिलाएं पकवान बनाती हैं और अगले दिन सुबह जल्दी उठकर शीतला मां की पूजा करने जाती हैं। देवी मां को भी पिछले दिन का बना बासी और ठंडा खाना भोग में चढ़ाया जाता है और वही बासी खाना खाया जाता है । इस दिन देवी मां को मीठे चावल, हलवा, पूड़ी, पुए और दही के बने पकवान चढ़ाने का चलन है । लेकिन वैज्ञानिक रूप से देखें तो यह दिन सर्द ऋतु का आखिरी दिन माना जाता है । सर्दियों में रात का बासी खाना सुबह तक खराब नहीं होता। इसलिए सुबह भी उसे खाया जा सकता है, लेकिन इस दिन के बाद से बासी खाना खाना बंद कर देना चाहिए । क्योंकि इस दिन के बाद से गर्मी का आरंभ होना शुरू हो जाता है और बासी खाना खराब होने लगता है । कहते हैं, साल में एक दिन सर्दी और गर्मी के संधि काल में ठंडा भोजन करने से पेट और पाचन तंत्र को भी फायदा होता है। ठंड के कारण कई लोगों को चेचक, फोड़े-फुंसी, पीत, ज्वर और आंखों से संबंधित बीमारियां हो जाती हैं या होने की संभावना रहती है । इसलिए शीतला अष्टमी के दिन बासी या ठंडा भोजन करना चाहिए। इस दिन किसी भी गरम चीज का सेवन नहीं करना चाहिए । क्योंकि गर्म और छोंक वाली चीजें बीमारियों को ज्यादा बढ़ाती हैं । इसी वजह से लोग इस दिन चूल्हा नहीं जलाते और एक दिन पहले बना हुआ बासी भोजन करते हैं । कहते है इस दिन के बाद ठंडे पानी से नहाना शुरू कर देना चाहिए । ठंडे पानी से नहाने से रक्तसंचार तो अच्छा रहता ही है, साथ ही इम्युनिटी सिस्टम भी मजबूत होता है । इससे शरीर में सफेद ब्लड सेल्स की मात्रा बढ़ती है, जो बीमारियों से लड़ने में हमारी मदद करते हैं ।

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Basora-A Custom of eating stale food

Sheetala Ashtami pooja muhurta Morning 08:19 to 06:28 pm in the evening, Duration: 10 hours 09 Minutes


The festival of Sheetala Ashtami is celebrated in every nook and corner of India in different forms. Goddess Sheetala is worshipped in this festival. Every year, in Falgun month after the festival of Holi, the festival of Sheetala Ashtami is celebrated. There is logic behind the name of Sheetala Ashtami. People should eat stale cold food on this day. The festival is highly popular in the areas of Malwa, Nimar and Rajasthan.On the day of Sheetala Ashtami, people consider the stone on their path as the Goddess and worship it with faith. For this reason, Goddess Sheetala is also known as Pathwari mata. The meaning of Pathwari mata means the way we go, the goddess of that path is Sheetala mata. According to our scriptures, we worship the stones of the path so that we never get strayed away from our path and stay safe while commencing the journeys. This act also preaches us the lesson to keep our environment clean and safe.  It is the custom of eating stale food or cold food on the day of Sheetala Ashtami. The women prepare the cuisines a day before the Sheetala Ashtami festival. The very next day, they get up early in the morning and worship the Goddess. The Goddess Sheetala is also offered the same stale food that was prepared the previous day. All the members of the family eat that stale food only. The Goddess is served sweet rice, halwa, poori, puae and cuisines prepared with curd. According to our shastras, the meaning of Sheetla is cold. The Goddess Sheetala loves the cold food. To make her happy, she is offered the same cold food. Scientifically, this day is the last day of winter season. During winters, food prepared at night does not get spoiled and hence it can be eaten till morning. However, after this day, the stale food should be strictly avoided because this denotes arrival of summers and stale food starts getting spoiled. It is believed that this day is the conjunction of summers and winters. Due to cold weather, many people suffer from pimples, acnes, boils, peet, fever and eyes related issues. Chances of such infection are likely. By eating stale and cold food on Shetala Ashtami , we can get rid of these problems. We should not eat any of the food that is warm in nature. It's because hot and spicy things gives an invitation to various diseases. Due to this reason, people do not cook on this day and eat stale food. Worship the Goddess Sheetala to cure Small pox and measles even today, small pox and measles like diseases are like catastrophe. They can be cured by worshipping the Goddess Sheetala. The tradition of curing the disease is done by the villagers in a unique way. According to the villagers, Goddess holds a broom and a traditional hand fan in her hand. She has a kalash in her other hand. A paste is prepared with the neem leaves that the Goddess has worn in her neck. That paste is applied on the boils of the patient. She holds a kalash in her hand which means that lots of water should be offered to the patients as they have immense heat in their body and that heat can only be eliminated by drinking cold water. This cures the disease. Apart from eating cold food, one should also take shower with cold water. On this day, people should get up early in the morning especially the ladies of the house and take shower with cold water and worship the Goddess. After this day, all people should take bath with cold water only. By taking shower with cold water, our blood circulation gets improved. It boosts immunity. It also increases the white blood cells in our body which helps in fighting various ailments. Apart from this, by taking shower with cold water, one can stay away from laziness and fatigue too.

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