Rahukaal Today/ 09 OCTOBER 2017 (Delhi)-15 OCTOBER 2017

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रामानन्द आचार्य जयंती - 30 अप्रैल 2017
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जगतगुरु स्वामी रामानंदाचार्य

 रामानंदाचार्य ने हिंदू धर्म को संगठित और व्यवस्थित करने के अथक प्रयास किए । उन्होंने वैष्णव सम्प्रदाय को पुनर्गठित

किया तथा वैष्णव साधुओं को उनका आत्मसम्मान दिलाया । रामानंद वैष्णव भक्तिधारा के महान संत हैं...

 

संन्त रामानन्द इनका सबसे महान कार्य यह है की इन्होने भक्ति को सभी लोगो को समान रूप से पालन करने का अधिकार दिया । उनका कहना था कि ”सभी मनुष्य ईश्वर की संतान है न कोई ऊंचा है न नीचा, मनुष्य-मनुष्य में कोई भेद नहीं है । सबसे प्रेम करो और सबके अधिकार समान है । रामानंद ने उत्तर भारत और दक्षिण भारत की भक्ति परम्पराओ में समन्वय स्थापित किया । रामानंद अर्थात् रामानंदाचार्य ने हिंदू धर्म को संगठित और व्यवस्थित करने के अथक प्रयास किए । उन्होंने वैष्णव सम्प्रदाय को पुनर्गठित किया तथा वैष्णव साधुओं को उनका आत्मसम्मान दिलाया । रामानंद वैष्णव भक्तिधारा के महान संत हैं । सोचें जिनके शिष्य संत कबीर और रविदास जैसे संत रहे हों तो वे कितने महान रहे होंगे । बादशाह गयासुद्दीन तुगलक ने हिंदू जनता और साधुओं पर हर तरह की पाबंदी लगा रखी थी । हिंदुओं पर बेवजह के कई नियम तथा बंधन थोपे जाते थे । इन सबसे छुटकारा दिलाने के लिए रामानंद ने बादशाह को योगबल के माध्यम से मजबूर कर दिया । अंततः बादशाह ने हिंदुओं पर अत्याचार करना बंद कर उन्हें अपने धार्मिक उत्सवों को मनाने तथा हिंदू तरीके से रहने की छूट दे दी । सन्त रामानन्द के पांच सौ से अधिक शिष्य सारे उत्तर भारत में घर-घर जाकर भक्ति का प्रचार-प्रसार करते थे । रामानंद क्रांतकारी महापुरुष थे । इन्होने रामानुजाचार्य की भक्ति परम्परा को उत्तर भारत में लोकप्रिय बनाया तथा ‘रामावत’ सम्प्रदाय का गठन कर रामतंत्र का प्रचार किया । सन्त रामानन्द के गुरु का नाम राघवानन्द था जिसका रामानुजाचार्य की भक्ति परम्परा में चैथा स्थान है । सन्त रामानन्द का जन्म सन 1299 ई. में प्रयाग में हुआ था । इनकी माता का नाम सुशीला और पिता का नाम पुण्य-दमन था । इनके माता-पिता धार्मिक विचारो और संस्कारो के थे । इसलिए रामानंद के विचारो पर भी माता-पिता के संस्कारो का प्रभाव पड़ा । बचपन से ही वे पूजा पाठ में रुचि लेने लगे थे । रामानंद की प्रारम्भिक शिक्षा प्रयाग में हुई । रामानंद प्रखर बुद्धि के बालक थे । अतः धर्मशास्त्रो का ज्ञान प्राप्त करने के लिए इन्हें काशी भेजा गया । वही दक्षिण भारत से आये गुरु राघवानन्द से उनकी भेंट हुई । रामानन्द संस्कृत के पंडित थे और संस्कृत में उन्होंने अनेक ग्रंथो की रचना की किन्तु उन्होंने अपने उपदेश व विचारो को जनभाषा हिंदी में प्रचारित प्रसारित कराया । उनका मानना था की हिन्दी ही एक मात्र ऐसी भाषा है जिसके माध्यम से सम्पूर्ण भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है । रामानन्द के विचार व उपदेशो ने दो धार्मिक मतों को जन्म दिया । एक रूढ़िवादी और दूसरा प्रगतिवादी । रूढ़िवादी विचारधारा के लोगो ने प्राचीन परम्पराओ व विचारो में विश्वास करके अपने सिद्धांतो व संस्कारो में परिवर्तन नहीं किया । प्रगतिवादी विचारधारा वाले लोगो ने स्वतंत्र रूप से ऐसे सिद्धांत अपनाये जो हिन्दू, मुसलमान सभी को मान्य थे । इस परिवर्तन से समाज में नीची समझी जाने वाली जातियों व स्त्रियों को समान अधिकार मिलने लगा । रामानन्द सिद्ध संत थे उनकी वाणी में जादू था । भक्ति में सराबोर रामानन्द ने ईश्वर भक्ति को सभी दुखों का निदान एवं सुखमय जीवन-यापन का सबसे अच्छा मार्ग बताया है । लगभग 112 वर्ष की आयु में सन 1411 ई. में रामानन्द का निधन हो गया । संत रामानन्द ‘राम’ के अनन्य भक्त और भक्ति आन्दोलन के ‘जनक’ के रूप में सदैव स्मरण किये जाते रहेंगे।

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