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सिद्धकुञ्जिका स्तोत्र - मार्च 2017
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सिद्धकुञ्जिका स्तोत्र


दुर्गासप्तशती हिंदू-धर्म का सर्वमान्य ग्रन्थ है । इसमें भगवती की कृपा के सुन्दर इतिहास के साथ बड़े-बड़े गूढ़ साधन-रहस्य भरे हैं । कर्म, भक्ति और ज्ञान की त्रिविध मन्दाकिनी बहाने वाला यह ग्रन्थ भक्तों की इच्छा पूरी करने वाला है । भक्त इस ग्रन्थ के पढ़ने से दुर्लभ से दुर्लभ वस्तु या स्थिति को भी सहज ही प्राप्त कर लेते हैं और मोक्ष पाकर कृतार्थ होते हैं । नवरात्र के दौरान तो दुर्गा सप्तशती का पाठ अत्यंत फलदायी होता है, लेकिन अगर कोई दुर्गा सप्तशती का पूरा ग्रंथ पढ़ने में असमर्थ हो तो उसे दुर्गा सप्तशती के सिद्धकुञ्जिका स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए । कहते हैं सिद्धकुञ्जिका स्तोत्र का पाठ करने से पूरी दुर्गा सप्तशती के पाठ का फल मिलता है । सिद्धकुञ्जिका स्तोत्र में सबसे पहले प्रथम चार श्लोकों का एक बार पाठ करें, उसके बाद दिए मंत्र का 11 या 21 बार जप करने के बाद बाकी बचे श्लोक का एक बार पाठ करें...

 

 शुणु देवि प्रवक्ष्यामि कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम् ।

येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत् ।।1।।

न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम् ।

न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम् ।।2।।

कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत् ।

अति गृह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम् ।।3।।

गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति ।

मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम् ।

पाठमात्रेण संसिद्ध्येत् कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम् ।।4।।

 

ऊँ ऐं हृीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ।। ऊँ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः

ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल

ऐं हृीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा

 

नमस्ते रुद्ररुपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि ।

नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि ।।1।।

नमस्ते शुम्भहन्त्रयै च निशुम्भासुरघातिनि ।।2।।

जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे ।

ऐंकारी सृष्टीरूपायै हृींकारी प्रतिपालिका ।।3।।

क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽतु ते ।

चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी ।।4।।

विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि ।।5।।

धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी ।

क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरू ।।6।।

हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी ।

भ्रां भ्रीं भ्रूर भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः ।।7।।  

अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं

धिजाग्रं धीजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरू कुरू स्वाहा ।।

पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा ।।8।।

सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे ।।

इदं तु कुञ्जिकास्तोत्रं मन्त्रजागर्तिहेतवे ।

अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति ।।

यस्तु कुञ्जिकया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत् ।

न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदानं यथा।।

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