Rahukaal Today/ 09 AUGUST 2017 (Delhi)-15 AUGUST 2017

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चैतन्य महाप्रभु जयंती - 12 मार्च 2017
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भक्ति आंदोलन के प्रणेता

वौष्णवों के गौड़ीय संप्रदाय की आधारशिला रखने वाले चैतन्य महाप्रभु भक्तिकाल के प्रमुख कवियों में से एक थे, जो वैष्णव धर्म के भक्ति योग के प्रचारक भी रहे हैं । इनका जन्म 1486 में फाल्गुन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को पश्चिम बंगाल के नवद्वीप (नादिया नामक गांव) में हुआ था। ये कृष्ण के परम भक्त थे । महाप्रभु ने राजनैतिक अस्थिरता के दिनों में हिंदू मुस्लिम एकता की सद्भावना को बल दिया, साथ ही इन्होंने दूसरों को जाति-पात व ऊंच-नीच की भावना को दूर करने की शिक्षा भी दी । चैतन्य महाप्रभु के द्वारा प्रारंभ किए गए महामंत्र नाम के संकीर्तन का व्यापक व सकारात्मक प्रभाव आज भी पश्चिमी जगत तक देखने को मिलता है । अपने जीवन का अंतिम समय इन्होंने वृंदावन में ही बिताया था । वैष्णव लोग तो इन्हें राधा-श्रीकृष्ण का ही अवतार मानते थे । हालांकि चैतन्य महाप्रभु द्वारा लिखे गए उनके आठ श्लोक मात्र ही इस समय उपलब्ध हैं, जिन्हें ‘शिक्षाष्टक’ कहा जाता है

 

तिलक का महत्व

मस्तक पर तिलक लगाना हिन्दु परम्परा में बहुत ही शुभ माना जाता है । तिलक को सात्विकता का प्रतीक माना जाता है । हिंदू संस्कृति में किसी भी शुभ काम की शुरुआत के लिये सबसे पहले तिलक लगाने की परंपरा होती है। विजय प्राप्त करने से पहले और बाद में, कोई नया काम शुरू करने के लिये जाते वक्त, पूजा-पाठ, हवन या फिर अन्य कोई अनुश्ठान करने से पहले और घर में मेहमानों के आगमन पर रोली, हल्दी या फिर चन्दन का तिलक लगाना शुभ माना जाता है । कहते हैं कि किसी काम में सफलता प्राप्ति के लिये या युद्ध में जाते वक्त अंगूठे से तिलक लगाना चाहिए । क्योंकि यह आयु वृद्धि व आरोग्य प्रदान करने वाला होता है । महिलाएं लाल रंग के कुमकुम का तिलक लगाती हैं । यह भी बिना प्रयोजन नहीं है । लाल रंग ऊर्जा एवं स्फूर्ति का प्रतीक होता है और यह महिलाओं के सौंदर्य में वृद्धि करता है । ऐसा माना जाता है कि मंदिर में पूजा के बाद तिलक लगाने से भगवान का आशीर्वाद मिलता है । कहते हैं कि मनुष्य के मस्तक के मध्य में स्वयं भगवान विष्णु का निवास होता है । इसलिए तिलक इसी स्थान पर लगाया जाता है । मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी तिलक लगाना उपयोगी माना गया है । मस्तिष्क के मध्य भाग में तिलक लगाने से दूसरे लोग आपकी ओर आकर्षित होते हैं । क्योंकि जब भी हम किसी दूसरे व्यक्ति को देखते हैं तो हमारी सबसे पहली नजर उसके चेहरे पर ही जाती है । मस्तिष्क के मध्य भाग को ‘आज्ञाचक्र’ कहते हैं । इस चक्र को गुरू चक्र भी कहा जाता है क्योकि यह स्वयं बृहस्पति गुरू का प्रतिनिधि माना जाता है। शरीर के इस भाग में जब तिलक लगाया जाता है तो यहां पर उपस्थित पीनियल ग्रन्थि ऊर्जावान हो जाती है और मस्तिष्क के अन्दर से एक तरह के प्रकाश की अनुभूति होती है जो हमारे चित्त को शांत करने के साथ-साथ हमारे भीतर एकाग्रता भी लाता है । इस बात को हमारे बुजुर्गों व ऋषि-मुनियों ने बहुत पहले ही भली-भांति जान लिया था । इसिलिए आज तक इस परंपरा का चलन चल रहा है ।

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