Rahukaal Today/ 15 June 2017 (Delhi)-21 June 2017

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09 जून, देव स्नान पूर्णिमा
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जगन्नाथ! देवस्नान पूर्णिमा को करेंगे शाहीस्नान


ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा कोे जगन्नाथ अपने बड़े भ्राता बलभद्र, बहन सुभद्रा और सुदर्शन के साथ शाही स्नान करेंगे । इस दौरान 108 भार स्नान के कारण भगवान जगन्नाथ शीतजनित रोग से रुग्ण होने पर उपचार के लिए गर्भगृह में चले जायेंगे। वे पूरे डेढ़ माह के उपचार के बाद स्वस्थ होकर रथयात्रा से करीब सप्ताहभर पूर्व अपने भक्तों को दर्शन देंगे। इसीलिये ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को देव स्नान पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है । यह इस वर्ष नौ जून, 2017 को है । ज्येष्ठ पूर्णिमा की अधिक धार्मिक महत्ता का दूसरा कारण यह भी है कि इसी दिन महादेव भक्त गंगा स्नान एवं पूजा-पाठ कर तुरंत ही गंगाजल लेकर अमरनाथ यात्रा प्रारम्भ कर देते है । खरसावां, हरिभंजा, राउरकेला और बंडामु्रंडा आदि स्थानों पर जहां-जहां भगवान जगन्नाथ के मंदिर हैं, वहां-वहां भगवान के शाही स्नान की तैयारियां जोरशोर से प्रारम्भ हो गयीं हैं। स्कन्द पुराण और भविष्य पुराण में देवस्नान पूर्णिमा के संबंध में विस्तार से वर्णन किया गया है। उपरोक्त पुराणों के अनुसार जिस दिन भगवान जगन्नाथ को बड़े भाई बलभद्र और बहन सभुद्रा के अलावा सुदर्शन के साथ शाही स्नान कराया जाता है, उसी तिथि को देव स्नान पूर्णिमा कहते हैं । उपरोक्त मंदिरों में यह रस्म ज्येष्ठ मास की पूणिमा को संपन्न होती है। इस दिन भगवान जगन्नाथ के भक्त निराहार रहकर वृत रखते हैं जिसका दिन ढलने पर सांय काल में पूजा अर्चना के बाद पारण करतें हैं । बताते है कि यहां जगन्नाथ मन्दिरों की देखा-देखी आसपास के अन्य मदिरों में भी अन्य देवी, देवताओं की मुर्तियों को स्नान कराने की परम्परा भी  प्रारम्भ हो गयी है । देवस्नान की यह रस्म मंदिरो के बाहर मंडपों में होती है । रस्म के अनुसार बड़े-बड़े बांस या बल्लियों से मंदिर के बाहर मंडप बनाया जाता है जिसे आच्छादित करके रंग-बिरंगे वस़्त्रों, फूल एवं पत्तियों से सजाकर भव्यता प्रदान की जाती है। तत्पश्चात एक-एक करके भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भ्राता बलभद्र, बहन सुभद्रा और सुदर्शन की चारों मुर्तियों को स्नान के लिए मंडप में लाया जाता है । यहां मंदिर के महंत, प्रबंधन कमेटी से जुड़े लोग और कुछ खास भक्तगण चारों मूतियों को स्नान करातें हैं। शाही स्नान से पूर्व चारों मूर्तियों को चंदन, हल्दी, तुलसी, केसर आदि से तैयार उबटन लगाया जाता है । इसके उपरांत चारों मूर्तियों के उनके भार से 108 गुणित भार जल से स्नान कराया जाता है। यह शाही स्नान प्रातः करीब नौ बजे प्रारम्भ हो कर पूर्वाहन ग्यारह बजे तक चलता है । चारों मूर्तियों का शाही स्नान होने के कारण इसे चतुर्था स्नान भी कहते हैं । इस दौरान बहुत सारे भक्त स्वयं जल, गंगाजल, दूध, दही और शहद आदि लाते हैं जो  इन चारों विगृहों को स्नान कराने वाली सामग्री में मिला कर स्वयं को धन्य मानते हैं । स्नान के उपरांत चारों विग्रहों के पुराने वस्त्र उतार कर उन्हें नये वस्त्र धारण कराये जातें हैं । इसके बाद भगवान की महाआरती होती है । इस महाआरती में श्रदालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है । मान्यता है कि इस महाआरती में पृथ्वीलोक पर जिस तरह श्रदालुओं की भीड़ उमड़ती है, ठीक उसी तरह आकाश में संपूर्ण 33 कोटि देवी, देवता एकत्र हो कर इस दिव्य दर्शन का लाभ एवं आनन्द लेते हैं । मान्यता यह भी है कि देव स्नान के दर्शन मा़त्र से मनुष्यों की बहुत सारी बाधाएं समाप्त हो कर शुभ संकेत मिलने शुरू हो जाते हैं । महाआरती के पश्चात ही भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र, बहन सुभद्रा और सुदर्शन के साथ शीतजनित रोग से रुग्ण हो जाते हैं। मंदिर के सेवादार इन विग्रहों को सर्दी लगने की बाकायदा घोषणा करते हैं कि भगवान जगन्नाथ सहित सभी चारों विग्रह अपने वजन से 108 गुणा जल से स्नान करने से वे अश्वस्थ  हो गये हैं । भक्तगण भगवान के स्वस्थ होने की कामना करें, जिससे स्वस्थ होने पर भगवान अपने भक्तों को दर्शन दे सकें । मंदिर के सेवादार जगन्नाथ सहित चारों विग्रहों को उपचार के लिए गर्भग्रह में पंहुचा देते हैं। मान्यतानुसार चारों विग्रह रुग्णावस्था में पूरे 45 दिन यानी डेढ़ माह गर्भग्ह में ही विश्राम करते हैं। इसके पश्चात्प चारों विग्रहों के दर्शन श्रदालुओं के लिए रथ यात्रा से सप्ताहभर पूर्व नेत्रशोभायात्रा के दौरान होंगे । शास्त्रों में ज्येष्ठ पूर्णिमा के महत्व से कई कथाएं जुड़ी हैं । महादेव भक्त इस दिन गंगा अथवा अपनी समीपवर्ती विभिन्न पुण्य नदियों में स्नान के उपरांत पूजा, पाठ करतें हैं । ये भक्त इस दौरान इन नदियों के जल से महादेव को स्नान कराने का संकल्प भी लेते हैं। वे संकल्प के अनुसार उसी समय नदियों का जल कलश आदि बर्तनों में भर कर अमरनाथ की यात्रा उसी समय प्रारम्भ कर देते हैं। ये भक्त इस जल से महादेव को स्नान कराकर स्वयं को धन्य मानतें हैं । इस पूर्णिमा को कबीर जयंती भी मनायी जाती है तथा सती सावित्री की कथा का भी सीधा संबन्ध ज्येष्ठ पूणिमा से जुड़ा है ।

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